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धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? हमारा क्या धर्म है?

  धर्म क्या है.....? प्रश्न एकदम सरल व सहज़ है पर उत्तर ज़रा जटिल है मैंने भी सुना है--- देह का धर्म,  हाथ का धर्म,  मानव धर्म,  पड़ोसी धर्म,  मित्र धर्म शत्रु धर्म,  युद्ध धर्म,  धर्म युद्ध इसके अलावा भी धर्म है। हिन्दू धर्म,  इस्लाम धर्म,  सिक्ख धर्म,  जैन धर्म,  ईसाई धर्म,  पारसी धर्म,  बौद्ध धर्म आदि आदि| और भी दूसरे धर्म हैं। इंसानियत का धर्म,  मानवता का धर्म,  परोपकार का धर्म,  समाज का धर्म,  राष्ट्र का धर्म,  न्याय का धर्म,  इसमें आपके मन भाने वाला धर्म भी है। मज़हब धर्म नहीं होता,  रिलीज़न धर्म नहीं होता,  धर्म में भ्रम नहीं होता,  भ्रम में धर्म नहीं होता मंथन के पश्चात का निष्कर्ष निकला- अहिंसा परमो धर्म: जहाँ दया तहँ धर्म मानवता सबसे बड़ा धर्म। सच्चा व्यवहार धर्म है। नेक नियति का राह धर्म है। परमारथ का काज धर्म है।

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥   अर्थ - "सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।" परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः ।  अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् ॥   भावार्थ : कोई अपरिचित व्यक्ति भी अगर आपकी मदद करे, तो उसे परिवार के सदस्य की तरह महत्व देना चाहिए । और अगर परिवार का कोई अपना सदस्य भी आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर देना चाहिए । ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमारी हो जाए, तो वह हमें तकलीफ पहुँचाने लगती है । जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है । चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया। न कूपखननं युक्तं प्रदीप्त वान्हिना गृहे॥ भावार्थ : जिस प्रकार से घर में आग लग जाने पर कुँआ खोदना आरम्भ करना युक्तिपूर्ण (सही) कार्य नहीं है उसी प्रकार से विपत्ति के आ जाने पर चिन्तित होना भी उपयुक्त कार्य नहीं है। (किसी भी प्रकार की विपत्ति से निबटने के लिए सदैव तत्पर रहना चाह...

विद्या का महत्व Importance of Knowledge in Life

सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् । सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥   भावार्थ : जिसे सुख की अभिलाषा हो (कष्ट उठाना न हो) उसे विद्या कहाँ से ? और विद्यार्थी को सुख कहाँ से ? सुख की ईच्छा रखनेवाले को विद्या की आशा छोडनी चाहिए, और विद्यार्थी को सुख की । न चोरहार्यं न च राजहार्यंन भ्रातृभाज्यं न च भारकारी । व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥   भावार्थ : विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहीं सकता, राजा ले नहीं सकता, भाईयों में उसका भाग नहीं होता, उसका भार नहीं लगता, (और) खर्च करने से बढता है । सचमुच, विद्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है । नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् । नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥   भावार्थ : विद्या जैसा बंधु नहीं, विद्या जैसा मित्र नहीं, (और) विद्या जैसा अन्य कोई धन या सुख नहीं । ज्ञातिभि र्वण्टयते नैव चोरेणापि न नीयते । दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम् ॥   भावार्थ : यह विद्यारुपी रत्न महान धन है, जिसका वितरण ज्ञातिजनों द्वारा हो नहीं सकता, जिसे चोर ले जा नहीं सकते...

प्रार्थना श्लोक || sanskrit prayer slokas

वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ: ।  निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥  भावार्थ : हे हाथी के जैसे विशालकाय जिसका तेज सूर्य की सहस्त्र किरणों के समान हैं । बिना विघ्न के मेरा कार्य पूर्ण हो और सदा ही मेरे लिए शुभ हो ऐसी कामना करते है । शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपद: ।  शत्रुबुध्दिविनाशाय दीपजोतिर्नामोस्तुते ॥  भावार्थ : ऐसे देवता को प्रणाम करती हूँ ,जो कल्याण करता है, रोग मुक्त रखता है, धन सम्पदा देता हैं, जो विपरीत बुध्दि का नाश करके मुझे सद मार्ग दिखाता हैं, ऐसी दीव्य ज्योति को मेरा परम नम: ।  या देवी सर्वभूतेशु, शक्तिरूपेण संस्थिता ।  नमस्तसयै, नमस्तसयै, नमस्तसयै नमो नम: ॥   भावार्थ : देवी सभी जगह व्याप्त है जिसमे सम्पूर्ण जगत की शक्ति निहित है ऐसी माँ भगवती को मेरा प्रणाम, मेरा प्रणाम, मेरा प्रणाम ।  सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।  शरण्ये त्र्म्बकें गौरी नारायणि नमोस्तुते ॥  भावार्थ : जो सभी में श्रेष्ठ है, मंगलमय हैं जो भगवान शिव की अर्धाग्नी हैं जो सभी की इच्छाओं को पूरा करती हैं ऐसी माँ भगवती को ...

संस्कृत गिनती (Counting in sanskrit )

1 - एकम् 2 - द्वे 3 - त्रीणि् 4 - चत्वारि 5 - पञ्च् 6 - षट् 7 - सप्त ...