संस्कृत में सुविचार
परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् । जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥ -सुभाषित रत्नावली परोपकार रहित मानव के जीवन को धिक्कार है । वे पशु धन्य है, मरने के बाद जिनका चमडा भी उपयोग में आता है । __________________________ यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति। काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम्।। #पंचतंत्र जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता ? ______________________________ एकः शत्रु र्न द्वितीयोऽस्ति शत्रुः । अज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् ॥ -महाभारत हे राजन् ! इन्सान का एक ही शत्रु है, अन्य कोई नहीं; वह है अज्ञान । ________________________________ षड् दोषा: पुरूषेण इह,हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध:,आलस्यं दीर्घसूत्रता ।। -विदुर नीति ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरूषों को - निद्रा, तन्द्रा , डर, क्...